Monday, 5 September 2011

भारत में केंद्रीय स्तर पर 'राइट टू रिकॉल' लागू करने की बात जोर-शोर से उठ रही है ,जिसमे मतदाता को यहाँ अधिकार होगा कि सही काम ना करने पर वह अपने चुने हुए जनप्रतिनिधि को वापस बुला सकता है.क्यों ना कानून बनाने की मांग में हम जो समय जाया करते है वो ही टाइम हम मतदाता को राजनेतिक रूप से शिक्षित एवं जाग्रत करने में लगाये . आप किसी भी विषय को ले लीजिये , कानून की कमी नहीं है इस देश में , कमी है तो बस उसे लागु करने की इच्छा शक्ति दिखने की , यदि हमारे देश के मतदाता राजनेतिक रूप से इतने परिपक्व हो गए तो वो पार्टी, जाती एवं धन के आधार पर ख़राब जनप्रतिनिधि चुनेंगे ही नहीं एवं उन्हें व निर्वाचित प्रतिनिधि को भी इस बात का आभास होगा कि चुना गया आदमी सिर्फ जनता का सेवक है ,उसे वो ही काम करना है जो जनता चाहती है , यदि जनता का कहा नहीं किया तो यह मालिक जनता कान पकड़ कर नौकरी से गेट आउट भी कर सकती है.मेरा एसा मानना है कि अगर जनता मतदाता राजनेतिक रूप से शिक्षित एवं जाग्रत नहीं है तो रिकाल करके वापस बुलाने पर भी सिर्फ अगले चुनाव का ही खर्चा है जिसका भर भी हमारे ही ऊपर टैक्स के रूप में पड़ने वाला है क्यूंकि जाग्रति के अभाव में अगली बार कोई दूसरा ख़राब नेता चुनाव जीत जायेगा एसा करके कितनी बार चुनाव करवाएंगे हम

Sunday, 4 September 2011

right to reject law dimanded by mr.arvind kejriwal.

आजकल टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य  श्री अरविन्द केजरीवाल का यह बयान मीडिया पर आ रहा है कि लोकपाल के बाद उनकी टीम का अगला आन्दोलन राईट टु रिकाल एवं  राईट टु रिजेक्ट (चुनावो के समय कोई उम्मीदवार पसंद नहीं आने पर सभी उम्मीदवारों को  रिजेक्ट करने का अधिकार ) के लिए होगा , " अभी भी चुनाव आचार संहिता १९६१ के तहत व्यवस्था दी हुई है कि यदि आपको वोटिंग मशीन में दिए प्रतिनिधियों में से कोई भी पसंद नहीं है तो आप पोलिंग बूथ पर मौजूद चुनाव अधिकारी से फॉर्म -४९ ओ मांग सकते है ,जिस पर आप अपने हस्ताक्षर या अंगूठा लगा कर सभी उम्मीदवारों  के लिए अपनी अरुचि जाहिर कर सकते है ,  अब इस इस्थ्ती में मेरे एक बात समझ नहीं आई कि राजनेतिक दलों के द्वारा तो ये बात जनता को इसलिए नहीं बताई कि जनता के ये बात जानने से उनके  उम्मीदवारों को जनता द्वारा  रिजेक्ट करने का खतरा है,परन्तु जब यह प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है तो श्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा इस मुद्दे पर आन्दोलन खड़ा करने कि बात क्यों कि जा रही है?