Pourushbhardwaj against corruption
Monday, 5 September 2011
Sunday, 4 September 2011
right to reject law dimanded by mr.arvind kejriwal.
आजकल टीम अन्ना के महत्वपूर्ण सदस्य श्री अरविन्द केजरीवाल का यह बयान मीडिया पर आ रहा है कि लोकपाल के बाद उनकी टीम का अगला आन्दोलन राईट टु रिकाल एवं राईट टु रिजेक्ट (चुनावो के समय कोई उम्मीदवार पसंद नहीं आने पर सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने का अधिकार ) के लिए होगा , " अभी भी चुनाव आचार संहिता १९६१ के तहत व्यवस्था दी हुई है कि यदि आपको वोटिंग मशीन में दिए प्रतिनिधियों में से कोई भी पसंद नहीं है तो आप पोलिंग बूथ पर मौजूद चुनाव अधिकारी से फॉर्म -४९ ओ मांग सकते है ,जिस पर आप अपने हस्ताक्षर या अंगूठा लगा कर सभी उम्मीदवारों के लिए अपनी अरुचि जाहिर कर सकते है , अब इस इस्थ्ती में मेरे एक बात समझ नहीं आई कि राजनेतिक दलों के द्वारा तो ये बात जनता को इसलिए नहीं बताई कि जनता के ये बात जानने से उनके उम्मीदवारों को जनता द्वारा रिजेक्ट करने का खतरा है,परन्तु जब यह प्रावधान पहले से कानून में मौजूद है तो श्री अरविन्द केजरीवाल द्वारा इस मुद्दे पर आन्दोलन खड़ा करने कि बात क्यों कि जा रही है?
Sunday, 28 August 2011
CITIZEN CHARTER PRODUSE BY GOVT. OF RAJASTHAN
अभी पिछले दिनों अन्नाजी जिन प्रमुख तीन मांगो को लेकर भूखहड़ताल पर बैठे थे उनमे से एक सिटिज़न चार्टर भी प्रमुख मांग थी,दोस्तों इस महत्वपूर्ण विषय पर संवेदनशीलता दिखाते हुए हमारे राजस्थान के लोकप्रिय गाँधीवादी मुख्यमंत्री श्री अशोकजी गहलोत की सरकार ने पिछले कुछ महीनो में इसे तैयार कर अभी हाल ही में आहूत विधानसभा के सत्र में पेश कर दिया है,जिसे विधानसभा के इसी सत्र में पारित करवा कर लागू करवा ...दिया जावेगा,जिसके लागु होने के बाद प्रत्येक कार्यालय में हर कार्य की अवधि तय कर दी जावेगी, उस अवधि में जनता के कार्य नहीं करने पर सरकारी अधिकारी या कर्मचारी जुर्माने या सजा का भागी होगा ,आइये जिस प्रकार हमने जनता की मांगे मनवाने पर माननीय श्री अन्ना साहब का स्वागत किया उसी प्रकार माननीय मुख्यमंत्री जी की भी इस एतिहासिक पहल का स्वागत करे
Thursday, 25 August 2011
on janlokpal bill!
दोस्तों कोई भी व्यवसाय या पार्टी या कास्ट गलत नहीं होती, गलत होती है उसकी नीतिया या क्रियाकालाप या उसमे बैठे लोग|बीजेपी में भी बहुत भ्रष्ट लीडर्स भरे पड़े है , उनके नेशनल प्रेसिडेंट बंगारूलक्स्मन को टीवि पर 1लाख लेते सबने देखा|जूदेव का कथन की "पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा की कसम उससे कम भी नहीं" आज भी याद करते है लोग| अम्बानी से प्रमोद महाजन की डील को,कारगिल की लड़ाई में हुआ शहीद ताबूतघोटाला जनता आज भी नहीं भूली है पर इसका मतलब ये भी नहीं की बीजेपी पूरी भ्रष्ट है| बहुत से अच्छे और इमानदार नेता भी है उसमे| आज जो इस्तथी है,इसका मतलब ये नहीं की वो कांग्रेस ने की है , आज जो हमारे समाज की हालत है इस इस्तथी में अगर बीजेपी की सरकार होती तो इससे भी बुरा हाल होता, हमारा समाज & देश अभी संक्रमण काल से गुज़र रहा है,दिशाहीनता की इस्थ्ती है पूरी देश दुनिया में|बदलाव का दौर चल रहा है हर ओर, चाहे वो लीबिया हो या मिस्र हो या अमेरिका|हर ओर बदलाव की जोर है और सत्ताधारी पार्टियाँ जनाक्रोश का शिकार हो रही है हर ओर|गीता में श्रीहरी ने भी कहा है कि जो हुआ वो अच्छा हुआ,जो हो रहा है वो भी अच्छा ही हो रहा है,और जो होगा वो भी अच्छा ही होगा इसलिए जो हो रहा है वो होने दिजीये और स्वागत किजीये हर बदलाव का क्यूंकि कोई भी बदलाव बिना जनसंघर्ष के ना तो होता है और ना होना चाहिए|इसलिए किसी पर आरोप प्रत्यारोप में अपने सम्बन्ध ख़राब मत कीजिये,अगर हम हमारे देश की भी बात करे तो यदि हमारी व्यवस्था को एक पेड़ मान लिया जावे तो भ्रष्ट नेता या सरकारी अधिकारी या जज तो उस पेड़ की डाली के फल भर है, उसे कितना भी तोड़ लो या हटा दो उसकी जगह फिर नया भ्रष्ट फल उग आएगा दोस्तों बुद्धिमानी फल तोड़ने में नहीं उस पेड़ की जड़ का इलाज करने मे है|हमारे समाज में आज दहेज़, कन्या भ्रूण हत्या, दोस्त बना करविश्वासघात करना, बेईमानी, बलात्कार,माँ बाप की सेवा से विमुख होना,भाई की संपत्ति हड़प जाना,या जिन महिलाओ से पवित्र रिश्ते है उन पर बुरी नीयत!ईन सब से कौनसा लोकपाल बचाएगा हमारे को?अगर मान लीजिये की सरकार अन्ना जी की बात को मान भी लेती है तो जब हम लाखो मतदाताओ के द्वारा चुने गए विधायक या सांसद ही इमानदार नहीं रह पा रहे तो जन्लोकपाल ईमानदार रहेगा इस बात की क्या गारंटी है? उस पोस्ट पर बिठाने के लिए ईमानदार लोकपाल कौन से समाज से लायेंगे हम?अगर हम हमारी संसदीय निर्वाचन प्रणाली को दोषपूर्ण बता कर ख़ारिज तो फिर क्या इसके विकल्प के रूप में फिर से राजतन्त्र या अंग्रेजो वाली नोकरशाही लायेंगे देश में? आज जब अन्ना जी भी इस बात को कह चुके है की "अगर चुनाव लड़ने जाऊ तो मेरी जमानत जब्त हो जाये क्यूंकि मेरे पास वोटरों को पिलाने के लिए शराब और खर्च करने के लिए पैसे नहीं है”अब आप सोचिये की अन्नाजी जैसे महान लोकप्रिय नेता ये बात बोल रहे है तो हमारे,आपके जैसे लोग चुनाव लडे तो उनका क्या हाल हो? आप जानते है की जब हमारे देश में पहला आम चुनाव 1951 में हुआ था,तब कुल मतदाता 17,50,00,000 थे तब कुल 2438 उम्मीदवारों का एवं सरकार का कुल खर्चा 10,35,00,000 रूपये हुआ था यानि प्रति व्यक्ति लगभग 60 पैसे और आज प्रति व्यक्ति कितना खर्च होता है ये किसी से छुपा नहीं है ये पैसा तो नेता नहीं खाते ? बल्कि वे तो खर्च ही करते है पर इस खर्च के बदले में वे कितना निकालते है? यही से तो शुरू होती है करप्शन की गंगोत्री,फिर नेता की आड़ में अधिकारी ,अधिकारी की आड़ में कर्मचारी सब के सब डुबकी लगते है, तो जब इस गंगा की गोमुखी हमारे समाज में चुनाव से ही शुरू हो रही है तो फिर क्यों न हम इसका मुख यही बंद कर दे| चुनाव के टाइम नेताओ की जाति, पार्टी, या उसका कितना भव्य प्रचार है, ये देखना बंद कीजिये| जो लोग पैसो के दम पर या बड़े नेताओ की चापलूसी के दम पर या फिर जिंदगी भर बेईमानी से अफसरी करके रिटायर होकर अपना दो नंबर का पैसा लेकर जनता के नेता बनने आ जाते है, ऐसे लोगो का चुनावो में बहिष्कार कर दीजिये| जो चुनाव लड़ने आया है आपके बीच, उसमे ये देखिये की उसे सार्वजानिक जीवन का या राजनीती का कितना अनुभव है अगर उसके पास किसी पार्टी का टिकेट नहीं है या खर्च करने के लिए पैसे नहीं है तो सब लोग मात्र पचास पचास रूपये का भी चंदा इकठ्ठा करके उसे चुनाव लडवा देंगे तो वो चुनाव जीत कर इमानदारी से आपकी सेवा तो करेगा ही साथ ही साथ आपका अहसान भी मानेगा|
एक विचारक ने कहा है कि “समाज को इतना नुकसान दुर्जन की दुर्जनता से नहीं होता कि जितना सज्ज़न की निष्क्रियता से होता है|”
यदि हमने हमारा समाज सुधार लिया तो फिर इस समाज से निकल कर अच्छे अच्छे लोग नेता,सरकारी अधिकारी या जज बनेगे फिर आप देखिएगा हमे किसी लोकपाल की जरुरत ही नहीं पड़ेगी!
दोस्तों कोई भी व्यवसाय या पार्टी या कास्ट गलत नहीं होती, गलत होती है उसकी नीतिया या क्रियाकालाप या उसमे बैठे लोग|बीजेपी में भी बहुत भ्रष्ट लीडर्स भरे पड़े है , उनके नेशनल प्रेसिडेंट बंगारूलक्स्मन को टीवि पर 1लाख लेते सबने देखा|जूदेव का कथन की "पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा की कसम उससे कम भी नहीं" आज भी याद करते है लोग| अम्बानी से प्रमोद महाजन की डील को,कारगिल की लड़ाई में हुआ शहीद ताबूतघोटाला जनता आज भी नहीं भूली है पर इसका मतलब ये भी नहीं की बीजेपी पूरी भ्रष्ट है| बहुत से अच्छे और इमानदार नेता भी है उसमे| आज जो इस्तथी है,इसका मतलब ये नहीं की वो कांग्रेस ने की है , आज जो हमारे समाज की हालत है इस इस्तथी में अगर बीजेपी की सरकार होती तो इससे भी बुरा हाल होता, हमारा समाज & देश अभी संक्रमण काल से गुज़र रहा है,दिशाहीनता की इस्थ्ती है पूरी देश दुनिया में|बदलाव का दौर चल रहा है हर ओर, चाहे वो लीबिया हो या मिस्र हो या अमेरिका|हर ओर बदलाव की जोर है और सत्ताधारी पार्टियाँ जनाक्रोश का शिकार हो रही है हर ओर|गीता में श्रीहरी ने भी कहा है कि जो हुआ वो अच्छा हुआ,जो हो रहा है वो भी अच्छा ही हो रहा है,और जो होगा वो भी अच्छा ही होगा इसलिए जो हो रहा है वो होने दिजीये और स्वागत किजीये हर बदलाव का क्यूंकि कोई भी बदलाव बिना जनसंघर्ष के ना तो होता है और ना होना चाहिए|इसलिए किसी पर आरोप प्रत्यारोप में अपने सम्बन्ध ख़राब मत कीजिये,अगर हम हमारे देश की भी बात करे तो यदि हमारी व्यवस्था को एक पेड़ मान लिया जावे तो भ्रष्ट नेता या सरकारी अधिकारी या जज तो उस पेड़ की डाली के फल भर है, उसे कितना भी तोड़ लो या हटा दो उसकी जगह फिर नया भ्रष्ट फल उग आएगा दोस्तों बुद्धिमानी फल तोड़ने में नहीं उस पेड़ की जड़ का इलाज करने मे है|हमारे समाज में आज दहेज़, कन्या भ्रूण हत्या, दोस्त बना करविश्वासघात करना, बेईमानी, बलात्कार,माँ बाप की सेवा से विमुख होना,भाई की संपत्ति हड़प जाना,या जिन महिलाओ से पवित्र रिश्ते है उन पर बुरी नीयत!ईन सब से कौनसा लोकपाल बचाएगा हमारे को?अगर मान लीजिये की सरकार अन्ना जी की बात को मान भी लेती है तो जब हम लाखो मतदाताओ के द्वारा चुने गए विधायक या सांसद ही इमानदार नहीं रह पा रहे तो जन्लोकपाल ईमानदार रहेगा इस बात की क्या गारंटी है? उस पोस्ट पर बिठाने के लिए ईमानदार लोकपाल कौन से समाज से लायेंगे हम?अगर हम हमारी संसदीय निर्वाचन प्रणाली को दोषपूर्ण बता कर ख़ारिज तो फिर क्या इसके विकल्प के रूप में फिर से राजतन्त्र या अंग्रेजो वाली नोकरशाही लायेंगे देश में? आज जब अन्ना जी भी इस बात को कह चुके है की "अगर चुनाव लड़ने जाऊ तो मेरी जमानत जब्त हो जाये क्यूंकि मेरे पास वोटरों को पिलाने के लिए शराब और खर्च करने के लिए पैसे नहीं है”अब आप सोचिये की अन्नाजी जैसे महान लोकप्रिय नेता ये बात बोल रहे है तो हमारे,आपके जैसे लोग चुनाव लडे तो उनका क्या हाल हो? आप जानते है की जब हमारे देश में पहला आम चुनाव 1951 में हुआ था,तब कुल मतदाता 17,50,00,000 थे तब कुल 2438 उम्मीदवारों का एवं सरकार का कुल खर्चा 10,35,00,000 रूपये हुआ था यानि प्रति व्यक्ति लगभग 60 पैसे और आज प्रति व्यक्ति कितना खर्च होता है ये किसी से छुपा नहीं है ये पैसा तो नेता नहीं खाते ? बल्कि वे तो खर्च ही करते है पर इस खर्च के बदले में वे कितना निकालते है? यही से तो शुरू होती है करप्शन की गंगोत्री,फिर नेता की आड़ में अधिकारी ,अधिकारी की आड़ में कर्मचारी सब के सब डुबकी लगते है, तो जब इस गंगा की गोमुखी हमारे समाज में चुनाव से ही शुरू हो रही है तो फिर क्यों न हम इसका मुख यही बंद कर दे| चुनाव के टाइम नेताओ की जाति, पार्टी, या उसका कितना भव्य प्रचार है, ये देखना बंद कीजिये| जो लोग पैसो के दम पर या बड़े नेताओ की चापलूसी के दम पर या फिर जिंदगी भर बेईमानी से अफसरी करके रिटायर होकर अपना दो नंबर का पैसा लेकर जनता के नेता बनने आ जाते है, ऐसे लोगो का चुनावो में बहिष्कार कर दीजिये| जो चुनाव लड़ने आया है आपके बीच, उसमे ये देखिये की उसे सार्वजानिक जीवन का या राजनीती का कितना अनुभव है अगर उसके पास किसी पार्टी का टिकेट नहीं है या खर्च करने के लिए पैसे नहीं है तो सब लोग मात्र पचास पचास रूपये का भी चंदा इकठ्ठा करके उसे चुनाव लडवा देंगे तो वो चुनाव जीत कर इमानदारी से आपकी सेवा तो करेगा ही साथ ही साथ आपका अहसान भी मानेगा|
एक विचारक ने कहा है कि “समाज को इतना नुकसान दुर्जन की दुर्जनता से नहीं होता कि जितना सज्ज़न की निष्क्रियता से होता है|”
यदि हमने हमारा समाज सुधार लिया तो फिर इस समाज से निकल कर अच्छे अच्छे लोग नेता,सरकारी अधिकारी या जज बनेगे फिर आप देखिएगा हमे किसी लोकपाल की जरुरत ही नहीं पड़ेगी!
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